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विकास व नागरिकता बिल के चाक पर घूमती राजनीति

Last Updated On : 18 Jan 2019

मनोज कुमार सिंह, गुवाहाटी से

पूर्वोत्तर के राज्यों में केन्द्र की सत्ता के साथ रहने और तोड़-जोड़ की राजनीति पुरानी परम्परा बन गई है। इसे अंजाम देने के लिए राज्यों के अलग-अलग किरदार हैं, जो अपने हिसाब से राजनीतिक समीकरण तैयार करते हैं और राजनीति को बदलते हैं। वैसे तो अलग-अलग राज्यों के अपने अलग-अलग स्थानीय मुद्दें हैं, लेकिन एनआरसी, नागरिकता संशोधन बिल और विकास के मुद्दे से क्षेत्र के प्राय: सभी राज्यों की राजनीति गरमाई हुई है। असम गण परिषद ने तो इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार से समर्थन तक वापस ले लिया है। असम के रुख को देखते हुए अन्य राज्यों में भी भाजपा विरोधी दल इस मुद्दे पर तीखे तेवर अपना रहे हैं। असम और इसके बाद मेघालय और मिजोरम की राजनीति इस मुद्दे पर कासी गर्म है। बांग्लादेश से आए बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए केन्द्र सरकार के प्रस्तावित नागरिकता बिल के खिलाफ 1985 की तरह असम में फिर से भाषा-संस्कृति आंदोलन धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। राज्य के जनमानस पर गहरा प्रभाव वाले छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) सहित 70 संगठन इस आंदोलन में कूद पड़े हैं। इस बिल में बंगाली हिन्दुओं के अलावा बांग्लादेश सहित दूसरे पड़ोसी देशों से आए जैन, सिख, बौद्ध और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने का प्राविधान रखा गया है। इसके साथ ही एनआरसी का मुद्दा भी उछल रहा है।

असम के मूल निवासी और असमिया, यहां तक कि 25 मार्च 1971 से पहले असम में आए बंगाली भी बिल का भारी विरोध कर रहे हैं। इन्हें आशंका है या यों कहें कि पूरा विश्वास है कि नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ तो असम की डेमोग्राफी पूरी तरह बिगड़ जाएगी। बड़ी संख्या में बांग्लादेशी बंगाली हिन्दू असम के नागरिक बन जाएंगे। इससे असम, असमिया भाषा-संस्कृति यहां के मूल निवासी और असमिया लोगों की पहचान और अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। असम दूसरा बंगाल बन जाएगा। असम की जनता का रुख देख कर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने नागरिकता बिल और एनआरसी के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। कांग्रेस प्रस्तावित बिल को असम समझौते का उल्लंघन करार दे रही है। नेता और नेता प्रतिपक्ष देवब्रत सैकिया कहते हैं कि 1985 में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तत्कालीन राज्य की कांग्रेस सरकार और बांग्लादेशी लोगों के साथ असम रिकॉर्ड त्रिपक्षीय समझौता करवाया था, जिसमें 25 मार्च 1971 से पहले असम में आए बांग्लादेश और दूसरे राज्यों से आए लोगों को असम की नागरिकता देने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन भाजपा सरकार ने उक्त बिल में 16 मई 2014 तक यहां आए बांग्लादेशी बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता देने का प्रावधान रखा है। यह असम समझौते और संविधान विरोधी है। मुसलमानों की हितैषी पार्टी एआईयूडीएफ इसका कड़ा विरोध कर रही है। यहां तक कि राज्य सरकार में शामिल असम गण परिषद (अगप) ही नागरिकता संशोधन बिल और एनआरसी का विरोध कर रही है। दो जनवरी को केन्द्र ने असम और इसकी भाषा-संस्कृति की सुरक्षित रखने के लिए कदम उठा कर स्थिति को संभालने की कोशिश की है, पर विपक्षी दल इसे छलावा करार दे रहे हैं। भाजपा ने इस मुद्दे पर ढुलमुल रवैया अपनाया है। वह क्षेत्र के विकास के मुद्दा को ज्यादा महत्व दे रही है।

पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय के लोग अपनी भाषा-संस्कृति और अपनी पहचान बचाए रखते हुए भारत में रहना चाहते हैं, उन्हें भी अपनी भाषा-संस्कृति पर हमला स्वीकार नहीं है। इस लिए भाजपा को छोड़ कर इन राज्यों में भी कांग्रेस के अलावा सत्ता और विपक्ष की क्षेत्रीय पार्टियां इस बिल का विरोध कर रही हैं। ईसाई बहुल मेघालय और मिजोरम में उक्त बिल का विरोध सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी साम्प्रदायिक पहचान बचाने के लिए हो रहा है। इसलिए इस बिल के खिलाफ असम से चली सांस्कृतिक आंदोलन की बयार मेघालय और मिजोरम पहुंचे पहुंचते साम्प्रदायिक रंग में रंग गई है। दोनों राज्यों में चर्च के फरमान चलते हैं। दोनों राज्यों में धार्मिक कट्टरता चरम पर है। दोनों राज्यों में ईसाई कट्टरता का अंदाजा हाल के बंद जैसा नजारा से लगाया सकता है। दोनों राज्यों में पार्टियां जनता के मिजाज को देखते हुए नागरिक बिल का विरोध कर रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों की राजनीति विकास के ईर्द-गिर्द घूम रही है, जिसको ले कर कांग्रेस और भाजपा के अलावा इन राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां खुद को विकास के पक्ष में होने का दावा कर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं। मेघालय और मिजोरम में क्षेत्रीय दल की सरकार हैं। दोनों राज्यों में सत्ताधारी दल एनडीए के घटक दल हैं। मेघालय में करनाड संगमा की पार्टी एनपीएफ और भाजपा की सरकार और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है और भाजपा बाहर से समर्थन कर रही है। त्रिपुरा में माकपा और कांग्रेस नागरिकता बिल के खिलाफ है, लेकिन भाजपा का विकास मुद्दे उस पर भारी पड़ रहा है और पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम अभी शान्त है।

असम की राजनीति के नए किरदार राज्य के उप मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा और मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल हैं। राज्य की सत्ता से कांग्रेस को बाहर कर भाजपा सरकार बनाने में दोनों की प्रमुख भूमिका रही। सोनोवाल असम के मूल निवासियों और असमिया चेहरा है, लेकिन हिमंत विश्व शर्मा कुशल प्रशासक होने के साथ ही तोड़-जोड़ और मैनेज करने के मास्टर हैं। सिर्फ असम ही नहीं, बल्कि ये पूरे पूर्वोत्तर के मैनेज मास्टर माने जाते हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती लूईस बर्गर घोटाला में नाम आना और नागरिकता संशोधन बिल की नाराजगी के बीच लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें जीतना है। इधर अभी भी प्रदेश भाजपा के एक बड़ा वर्ग ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है, जो सोनोवाल के साथ है।

नागालैंड के मुख्यमंत्री निफियू रिओ की राज्य के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं पर अच्छी पकड़ है। यही इनका सबसे बड़ा राजनीतिक आधार है। इनकी सबसे बड़ी चुनौती नागालिम की मांग कर रहे 11 नागा संगठनों को मैनेज कर अगले लोकसभा में उनका समर्थन हासिल करना है। भाजपा के साथ गठबंधन होने और कांग्रेस के कमजोर होने से भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा है। इनके तोड़-जोड़ में माहिर होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के तीन बार मुख्यमंत्री के बाद सांसद रहे और जनवरी 2018 में एनडीपीपी बना कर मार्च में अपने तत्कालीन सत्ताधारी एनपीएफ के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार से नामांकन वापस करवा कर बिना मतदान के विधानसभा चुनाव जीते। साथ ही एनपीएफ से भाजपा का 15 साल पुराना गठबंधन तुड़वा कर उसके समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए। मणिपुर की राजनीति के मुख्य किरदार भाजपा नेता और मुख्यमंत्री लंगथोमबान बीरेन सिंह हैं। फुटबालर और पत्रकार रहे सिंह की राजनीति में बेहतर पकड़ है। राज्य के बहु संख्यक मैतई (हिन्दुओं) में अच्छा प्रभाव है और सांगठनिक क्षमता इनकी राजनीतिक ताकत है। इनकी सबसे बड़ी चुनौती नागा संगठनों और सहयोगी दल को साथ रखते हुए लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतना और नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रही ईकाइयों को अपने वोट बैंक में शामिल करना है। मेघालय में मुख्यमंत्री और नेशनलिस्ट पीपुल्स फ्रंट प्रमुख करनाड संगमा राजनीतिक सूझबूझ के धनी हैं। संगमा को राजनीति अपने पिता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा से मिली है। राज्य के बड़े राजनीतिक परिवार से होने के कारण लोगों में लोकप्रिय हैं। राज्य के बहुसंख्यक ईसाइयों में इनका व्यापक प्रभाव है, लेकिन भाजपा से गठबंधन होने के कारण नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रही ईकाइयों की नाराजगी दूर करना और भाजपा से गठबंधन जारी रखते हुए अपनी लोकसभा सीट बनाए रखना चुनौती है। ऐसे में नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रही कांग्रेस के पाले में ईकाइयों को जाने से रोकना भी संगमा की बड़ी चुनौती है। मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेता जोरमाथांग का राज्य के करीब 90 प्रतिशत ईसाइयों पर इनका खासा प्रभाव है। लोगों में इनकी छवि ईमानदार नेता की है। इनकी सबसे बड़ी चुनौती चर्च और यंग मिजो एसोसिशन की लाइन पर चलते हुए एनडीए में बने रहना व लोकसभा सीट बचाना है। अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम खान्डु पीपुल्स पार्टी ऑफ अरूणाचल से भाजपा में आए। खान्डु की राज्य की राजनीति में परिपक्व नेता की छवि है। पार्टी के संगठन पर उनकी पकड़ होने के साथ अधिकतर आदिवासी समूहों में लोकप्रिय हैं। इनकी सबसे बड़ी चुनौती अगले लोकसभा चुनाव में राज्य की दो लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को हराना व भाजपा को जीत दिलाना है। इनकी भूमिका सीमित नजर आ रही है। सिक्किम में मुख्यमंत्री पवन चामलिंग का जनता में ईमानदार और राज्य का विकास करने वाले नेता के रूप में प्रभाव है। राज्य का विकास उनका मजबूत पक्ष है, चुनौती कुछ भी नहीं और उनकी भूमिका भी सीमित आ रही है।

Published From : Patrika.com RSS Feed

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